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SDGs for All

SDGs for All is a joint media project of the global news organization International Press Syndicate (INPS) and the lay Buddhist network Soka Gakkai International (SGI). It aims to promote the Sustainable Development Goals (SDGs), which are at the heart of the 2030 Agenda for Sustainable Development, a comprehensive, far-reaching and people-centred set of universal and transformative goals and targets. It offers in-depth news and analyses of local, national, regional and global action for people, planet and prosperity. This project website is also a reference point for discussions, decisions and substantive actions related to 17 goals and 169 targets to move the world onto a sustainable and resilient path.

द्वारा नइमुल हक

ढाका (आईडीएन) – ऑर्बिस इंटरनेशनल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और अध्यक्ष जॉन बॉब रांक जिन्हें बॉब के नाम से भी जाना जाता है, हाल ही में एक विशेष मिशन के सिलसिले में बांग्लादेश आए थे। उन्होंने कुछ ऐसे अस्पतालों का दौरा किया जहाँ बचे जा सकने वाली (परिहार्य) दृष्टिहीनता को दूर करने के बांग्लादेश के प्रयासों में एक साझेदार के रूप में ऑर्बिस सहायता दे रहा है।  

संयुक्त राज्य वात्य सेना के सेवानिवृत्त बिग्रेडियर जनरल बॉब बांग्लादेश में अस्पतालों को शिक्षण या फ्लाइंग आई हॉस्पिटल (एफईएच) प्रशिक्षण कार्यक्रम के नाम से बेहतर जाने जाने वाली यादगार यात्रा के कुछ हफ्तों के बाद बांग्लादेश आए थे।  

कलिंगा सेनेविरातने द्वारा

चन्थाबुरि, उत्तर-पूर्व थाईलैंड (idn) – राज्य की जीवन शक्ति – कृषि और उसके छोटे पैमाने के किसानों को निकट भविष्य में चिरस्थायी बनाने के लिए ‘पर्याप्तता अर्थव्यवस्था’ की बौद्ध अवधारणा में एकीकृत आधुनिक (सूचना संचार प्रौद्योगिकी ICT) द्वारा समर्थित "स्मार्ट खेत" फार्मूले के तहत थाई किसान बुनियादी बातें अपना रहे हैं।

अपनी प्रचुर बहु-फसल डुरियन खेती में यहां IDN से बात करते हुए किसान सिटिपॉन्ग यनासो का कहना है कि “कुछ किसान रासायनिक उर्वरकों का उपयोग [अपने पेड़ों से] अधिक फल पाने के लिए करते हैं (लेकिन) उनके तने तीन से पांच साल में मर जाते हैं। हम यहाँ जैविक उर्वरक का उपयोग करते हैं और हमारे तने 30 वर्षों तक चलेंगे”।

जूलिया ज़िमरमैन द्वारा*

वियना (IDN) - जब युद्ध और इसके निहित खतरों के बारे में सोचते हैं, तो जेहन में आने वाला पहला ख़याल शायद युद्ध के मैदान पर मौत और उसके साथ होने वाली मानव जीवन की क्षति का होता है; हालांकि, केवल सैनिक ही युद्ध के शिकार नहीं होते हैं। नागरिक भी बहुत प्रभावित होते हैं, और इसका प्रभाव विशेष रूप से महिलाओं के लिए विनाशकारी हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र वियना सम्मेलन (ACUNS UN Vienna conference) में, इस्लाम एच बल्ला, यूनाइटेड नेशंस ऑफिस फॉर डिसआर्मामेण्ट अफेयर्स (UNODA) के प्रमुख, ने कहा कि किसी संघर्ष से पहले, इसके दौरान तथा इसके बाद में महिलाओं द्वारा झेले जाने वाली व्यवस्थित हिंसा को संबोधित करना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए अनिवार्य है। उन्होंने मेजर जनरल पैट्रिक गैमर्ट का हवाला देते हुए कहा, जिन्होंने 2008 में कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के संयुक्त राष्ट्र मिशन (UN Mission to the Democratic Republic of Congo) के उप-सेना कमांडर रहते हुए यह अवलोकन किया था: "अब आधुनिक युद्ध और संघर्ष में एक सैनिक की तुलना में एक महिला होना अधिक खतरनाक है।"

फोटो: दार एस सलाम में एमचिकिचिनी बाज़ार में अपने ग्राहकों की प्रतीक्षा में अपने लकड़ी के स्टाल पर बैठी आयशा शाबान। वह उन महिलाओं में से एक है जिन्हें महिला सशक्तिकरण और लैंगिक हिंसा से बचने के तरीके में हाल ही में प्रशिक्षित किया गया है। सौजन्य: किज़ितो मकोये | आईडीएन-आईएनपीएस

+किज़ितो मकोये द्वारा

दार एस सलाम (आईडीएन) – लैंगिक समानता को प्रोत्साहन देने के प्रयासों के बावजूद, तंज़ानिया में स्त्रियाँ और लड़कियाँ अब भी अधिकारहीन और मोटे तौर पर बेकार नागरिक हैं – जो एक पक्षपातपूर्ण पुरुष-प्रधान प्रणाली के कारण अक्सर पुरुष नागरिकों के भेदभाव और हिंसा का शिकार बनती हैं तथा उत्तरजीविता के कगार पर खड़ी हैं।

तथापि, संयुक्त राष्ट्र संघ के संधारणीय विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals - SDGs) के अनुरूप स्त्रियों को सशक्त बनाने के लिए विभिन्न पहलें लागू की जा रही हैं, हालांकि उनको अब भी अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँचने से रोकने वाले अवरोधों का सामना करना पड़ रहा है।

अन्य चीजों में, SDG स्त्रियों के सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, उत्तम काम और राजनीतिक और आर्थिक निर्णय प्रक्रियाओं में उचित प्रतिनिधित्व का आह्वान करते हैं, तथा इस दिशा में इस पूर्व अफ्रीकी देश में फिलहाल जारी कुछ पहलें निम्नानुसार हैं।

फोटो: कुतुप्पलोंग शरणार्थी शिविर, कॉक्स बाज़ार, बांग्लादेश।यह शिविर उन तीन शिविरों में से एक है जिनमें बर्मा में अंतर-सांप्रदायिक हिंसा से बच कर भागे हुए लगभग 300,000 रोइंग लोग रह रहे हैं। क्रेडिट: विकिपीडिया कॉमन्स

जयश्री प्रियालाल* द्वारा

सिंगापुर (आईडीएन) - रोहंगिया संकट और शरणार्थियों का भारी संख्या में बांग्लादेश की ओर प्रवाह का मुद्दा वर्तमान में मीडिया में छाया हुआ है। एक श्रीलंकाई के रूप में मैं पूर्व में श्रीलंका और वर्तमान में म्यांमार में इस राष्ट्रीयता के विवाद की समानता को समझ सकता हूँ। भारत के साथ इस संकट को हल करने का श्रीलंका का दृष्टिकोण म्यांमार द्वारा अनुसरण के लिए एक रूपरेखा प्रदान कर सकता है।

1948 में जब श्रीलंका ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ तब इस द्वीपीय राष्ट्र में करीब 10 लाख तमिल थे जिन्हें श्रीलंका में "भारतीय तमिल" कहा जाता था। इन निम्नतम दलित वर्ग के लोगों को अंग्रेजों द्वारा सिंहली किसानों की जब्त की हुई भूमि पर लगाए गए चाय बागानों में काम करने के लिए दक्षिण भारत से लाया गया था, जहाँ कि उन सिंहली किसानों ने काम करने से इनकार कर दिया था। इस प्रकार इन तमिलों की उपस्थिति का सिंहलियों द्वारा जबर्दस्त विरोध किया गया। अंग्रेज़ों ने एक राष्ट्रविहीन समुदाय बना दिया जिसके नागरिक न भारतीय रहे न श्रीलंकाई।

फोटो: अफ्रीका में बहुत से लोगों के लिए महासागरीय जीवन का महत्व बहुत कम है क्योंकि वे फोटो में दिखाए गए केप टाउन के समुद्र तटों जैसे म्यूज़ेनबर्ग समुद्र तट पर छुट्टियों का आनंद लेते हैं। क्रेडिट: जेफरी मोयो/ आईडीएन

जेफरी मोयो द्वारा

हरारे (आईडीएन) - सुबह होते ही, पेटिना ड्यूबे अपने घर से निकलती हैं, उनके सर पर उस कचरे से भरी बोरी है जो उनके घर के आँगन में पड़ा हुआ था क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार ज़िम्बाब्वे की राजधानी हरारे में नगरपालिका के कचरा एकत्रित करने वालों के पास अपना कार्य करने के लिए ईंधन उपलब्ध नहीं है।

43 वर्ष की ड्यूबे जो हरारे के उच्च घनत्व वाले उपनगर वॉरेन पार्क की निवासी हैं को जाहिर तौर पर कोई परवाह नहीं है कि उसके द्वारा फेंका जाने वाला कचरा कहाँ जाएगा। ड्यूबे कहती हैं "मैं वाकई में इस बात को ले कर चिंतित नहीं हूं कि यह कचरा कहाँ जाएगा; मैं बस इसे पास ही स्थित नदी के पास फेंक दूँगी।"

फोटो: फुनाफुटी एटोल पर एक समुद्र तट, तुवालु, पर एक खिले हुए दिन। क्रेडिट: विकिपीडिया कॉमन्स।

रमेश जौरा द्वारा

बॉन (आईडीएन) - दुनिया के 48 सबसे गरीब और जलवायु परिवर्तन के संबंध में सबसे संवेदनशील देश इस बात को ले कर खासे चिंतित हैं कि क्या आने वाले महीनों में 2015 में पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन समझौते के सभी पहलुओं को लागू किया जाएगा।

इस बात को सर्वाधिक अविकसित देशों के समूह (एलडीसी) के अध्यक्ष, इथियोपिया के गेब्रू जेम्बर एन्दलेव ने बॉन में दो सप्ताह की संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता के अंतिम दिन 18 मई को जोर दे कर कहा। इस वार्ता में 140 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

एलडीसी उन देशों का समूह है जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने उनकी न्यून सकल राष्ट्रीय आय, कमज़ोर मानवीय संसाधन और अत्यधिक आर्थिक असुरक्षा के आधार पर "सर्वाधिक अविकसित" देशों के रूप में वर्गीकृत किया हुआ है।

फोटो: लड़कियां, मालावी में युवा संरक्षण कार्यक्रम से। यह कार्यक्रम यौन और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्रदान करता है, युवा लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में मदद करता है और नेतृत्व प्रशिक्षण प्रदान करता है। क्रेडिट: यूएनएफपीए मालावी / होप नोवीरा

लेखक जे. नेस्ट्रेनिस

न्यू यार्क (आईडीएन) - संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या निधि यूएनएफपीए के नए शोध से पता चला है कि प्रति व्यक्ति पर प्रति वर्ष खर्च किए 30 डॉलर से भी कम में किशोर स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत काम किया जा सकता है।

यह रिपोर्ट 'दी लैनसेट' में 21 अप्रैल से 23 अप्रैल 2017 तक वाशिंगटन डीसी में विश्व बैंक स्प्रिंग बैठकों की पूर्व संध्या पर प्रकाशित हुई है। इन बैठकों में 188 देशों के वित्त और विकास के नेताओं द्वारा किशोरों पर निवेश किये जाने की आवश्यकता पर पर चर्चा की जानी थी।

दी लैनसेट एक स्वतंत्र, अंतरराष्ट्रीय व्यापक चिकित्सा पत्रिका है जिसका उद्देश्य विज्ञान को व्यापक रूप से उपलब्ध कराना है ताकि औषधि समाज की सेवा करते हुए इसे बदल सके और लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सके।

फोटो: 1 जून, 2016 को ग्योंग्जू, दक्षिण कोरिया में एक संवाददाता सम्मेलन में संचार एवं जन सूचना के लिए संयुक्त राष्ट्र की अंडर-सेक्रेटरी-जनरल, क्रिस्टीना गैलाच। क्रेडिट: कत्सुहीरो असागिरी। आईडीएन-आईएनपीएस

संचार और जन सूचना के लिए संयुक्त राष्ट्र की अंडर-सेक्रेटरी-जनरल, क्रिस्टीना गैलाच के साथ साक्षात्कार

न्यूयॉर्क (आईडीएन) - गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रतिनिधियों और शिक्षाविदों ने 1 जून, 2016 को दक्षिण कोरिया के ग्योंग्जू में संपन्न 66वें संयुक्त राष्ट्र के जन सूचना विभाग (डीपीआई) / एनजीओ के सम्मेलन में सतत विकास लक्ष्य 4 - सभी के लिए समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना और आजीवन अवसरों को बढ़ावा देना - के महत्व को स्वीकार करते हुए एक वैश्विक शिक्षा कार्रवाई एजेंडे को अपनाया था।

तब से क्या कुछ हुआ है? सितंबर 2015 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा समर्थित सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के कार्यान्वयन के दूसरे वर्ष में युवा समूह क्या भूमिका निभा रहे हैं? क्या जनवरी में एक नए सेक्रेटरी-जनरल और प्रबंधन टीम के पदभार ग्रहण करने के बावजूद 2017 में एक डीपीआई/एनजीओ सम्मेलन आयोजित होगा? संयुक्त राष्ट्र में संचार और जन सूचना के लिए अंडर-सेक्रेटरी जनरल के रूप में सेवारत होने का क्या मतलब है?

Photo: Youths of Rocket and Space group in Kathmandu brainstorm on how to make their presentations on Sexual and Reproductive Rights more effective. Credit: Stella Paul | IDN-INPS

स्टेला पॉल का आलेख

काठमांडू (आईडीएन) - 21 वर्षीया पवित्रा भट्टराई मीठी आवाज और दिलकश मुस्कान बिखेरने वाली एक शर्मीली युवती है। लेकिन जब उससे यौन स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में पूछा जाता है तो उसकी शर्म एक पल में गायब हो जाती है जब वह तत्परता से यह बताती है कि कैसे उसके देश के युवाओं के पास इस तरह की सेवाओं का अधिकार होना चाहिए।

अचानक वह अपनी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व दिखते हुए कहती है, "हमारा देश युवा लोगों के कंधों पर चलता है। इसलिए हम एचआईवी से ग्रस्त युवा लोगों से भरा देश होने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। हमारे पास यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं (SRHR) की पूरी पहुँच होनी चाहिए।"

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